अमरलता के बेले और पेड़ - 100th Poem


चहकती  थी  हर  उस  डाल   पर  बैठी  पंछियाँ,
अब  पतझर  सा  लगता , एक ठूंठ  सा खरा पेड़ !

बड़े  सुने  सुने  से  सुनसान  सा  प्रतीत  होता ,
ना  झूले  है  उस  पर, यूँ  बाट जोहती  टहनियाँ !

कुछ  अमरलता  की  बेले , चढ़  रही  है  ऊपर .
ये  प्यार  प्रपंच  ना  जान  सके  मुरझाये  मन  ! 

अपने  बदन  पर  लिपटी  ये  परायी  हरयाली, 
लग  रही  जैसे  वापस  छा  गयी  उमंग यौवन की ! 

अल्हरता भरी   ये  उन्माद  उन  बेलों  की,
हाथ  थामे  साख  चूमे  छा गयी  बदन  पर !

क्यूँ  कसमसाहट  सी  हो  रही ,
जैसे  बंद  पाश  में  अब  हो  जीवन,
पराये ये  पत्ते  मेरे  पंख नहीं  है  ये,
अब  परायी  हरयाली  घुटन  सी  लगती !

लिपटे  घने  अब  घुटन  सी  होती  उसको,
ये  किस  प्रेम  पाश  ने बाँधा  था उसको ..
अब  निराली  नही  लगती  अल्हर  बेलो  से  बात..
अब  उन्माद  नहीं  रहा  अपने  बदन  पर  लिपटे  बेलो  से,

मांगता  चाहता  मिल  जाये , फिर  वही उदासी सही,
भले  ना  सजे  पत्ते , हो  खाली हर  अंग  ..
नीरीह  हो  जाये  ये  वन ..
कोई  बात  हो  उन  पंछियों  से  फिर  !
फिर  झुलू  गोरियों  के  संग ..
अब  लगता  ये  जीवन  अनंत  !

# Sujit Thoughts Continued ......!

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