
ये गंगा की धुँधली तलहटी या,
या उसकी ममता का पसरा आँगन !
हर सुबह ..
नजर आती है मंदाकनी का फैला जहाँ,
और छितिज पर गुलाबी आभा मिलती हुई !
बचपन ...
ये बचपन का नाता कुछ पुराना,
तट भागीरथी और अबोध नजरे मेरी,
रोज देखती उस और किसी सवाल से..
थी उम्र जब तेरी माटी पर लोटा,
वो कोतुहल अल्हरता तुझसे जो समझा !
और जब हर साँझ थका हारा इस जिंदगी से,
खामोश से खरा उस बालूचर किनारों पर तेरे,
लगती एक प्रेयसी सी जाहनवी तेरी फैली बाहें,
करते बातें जैसे घंटो टिकाये नजरों एक ओर !
शायद जीवन के इन हर भावों को सिखा तुझसे,
मंदाकिनी की चपलता, वेग संवेग निरंतरता,
तो देखा कभी सरिते तेरी उफान उछाल लहरों को !
देखा उस मांझी को, ना भाव ना कोई लकीरे माथे पर,
एक मस्ती में पतवार, और दो गीत के धुन होठों से,
यूँ बटोरा साहस इस जग नैया को पार लगाने की !
भगीरथी तेरा प्यार पर लगता अकिंचन हम,
यूँ जीवन की धारा थमे सुरसरिता की इसी माटी पर,
और माँ सी कोमल तू पखार ले जाये हर कण कण !
सुजीत
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