
सुख, चैन , और छिना मेरा शहर,
और कहते मेरे खुदा तुम मुझसे ..
अब तेरी मेरी बनती नही ! ! (:
छूटे साथी और संग,
बदला बदला हर रंग,
उड़ गयी सब तितलियाँ,
सुने पड़े है बाग मेरे !
सूखे पत्ते की तरह,
सपने जले परे सारे !
परायी गलियों में देखता,
अजनबी चेहरा हर आते जाते !
चुप सा सोचता रह जाता,
वो शाम और सुबह उमंगो वाली !
कैसा ये अगणित बोझ लिये,
बेकल सा लगता मन !
जैसे लगता भटकता सिकंदर,
इस हार की पीड़ा का क्या हल,
कैसे करे सजदा तेरे दर पर,
और क्या माँगे ही तुझसे,
और कहते मेरे खुदा तुम मुझसे ..
अब तेरी मेरी बनती नही !
: सुजीत
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