
नकाबपोश रातें रातों सी जिंदगी ..
ना संवरती ना बिखरती !
गम था, पर दिखना था संजीदा,
नकाबपोश जो भीड़ में खरे थे !
बिखेरी, थोरी सी एक बनाई हुई हँसी,
जैसे आंसू सूखे रेत के चेहरों में फँसी !
मुखोटे लगाये चेहरों ने घेरा मुझे,
ना राग कोई, ना द्वेष कोई ...
ना घृणा हुई ना तृष्णा हुई ...
पता नही क्या समझा मुझे ..
थमा गया तलवार कोई तो ढाल कोई !
समझा नही इस जीवन को मैंने,
पर जान गया मैं राज कई !
सुजीत
Labels: Hindi Poem, hindi poetry, Life in Solitude, Midnight Thoughts, Midnight Solitude, Midnight Thoughts, Night Thoughts, Occasional Poet, Solitude Poetry, Visored Faces