
स्पंदन मात्र भी नहीं था चेहरों पर,
विस्मित ना हुए नयन भी थोड़े भी,
बड़ी ही क्षणिक अनुभूति सी थी..
जैसे पथराये से आँखों को छु गयी,
एक झलक सहलाती हुई दूर जाती !
जैसे भिगों गयी ओस की दो बूंद,
धरा की कोमल घासों को चूमती हुई !
जैसे दो शब्द में छुपे थे वही,
खुशबू आबो हवा सदियों बीती वाली,
हमारी रुंधे गले से निकले दो संगीत,
भ्रम हो या हो कोई सच सवेरे का,
आहट आज जानी पहचानी सी लगी,
किसी के वापस आने की इन गलियों में !
Sujit Kr..
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