मसखरे की ख़ामोशी का क्या


मेरे द्वंद से तुम सब को खामोश होते देखा,
देखा मैंने शिकन की रेखाओं को उभरते..
ना जता सका देखा तुझे चुप चाप कुछ सहते हुए !

क्यों किस उम्मीद से नजरे उठाते हो मेरी तरफ,
ये उम्मीद ही जो मुझे मुझसा ही नही होने देता,

दिन ढले दबे पावं लौटते उस अस्ताचल में,
नही छोरते आस लौटने की मेरी अगली सुबह !

ना जिद है मेरी और ना खता भी कोई मेरी ..
रहनुमा बन के, अब हर सजा ही तो है मेरी !

पर हँस देता हूँ.. दूर तक छाई सन्नाटे में एक दरार को लाने..
हँसा तो दू सबको, पर मसखरे की ख़ामोशी का क्या ...( क्रमशः .... )

सुजीत




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