
कई रातें लंबी बीती थी सदियों जैसी,
ऐसी तंग गलियों में युग सा था चाँद को देखा,
याद हमें एक आती है जब साँझ पसरते ..
उमस सी सावन होती थी..सब होते थे छत पर,
तब माँ चुपके से आती थी, और वो दूर हमें दिखाती थी !
सात तारों को संग लेके वो एक तारा दिखलाती थी !
सदियाँ बीती हर बातों की ..
अब लम्हों को बस उलझते देखा !
एक रोज दूर परे, भटके से निकले..
कुछ सायों को संग चलते देखा !
उमस पर कुछ सावन भी बरसी,
साँझ को रात ओढ़ के हरषी !
तब फिर,
सदियों परे रात के नभ चल तारों को देखा ,
सात सहेली को फिर संग मिलते देखा !
Sujit
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