बैठे हो क्यों ख्वाब बन कर ?

खामोश ही सही, पर रहों आसपास बनकर !
बिखर जाओ भले, रह जाओ एक अहसास बनकर !
दूर जाने से किसे कौन रोके, ठहर जाओ बस कुछ याद बनकर !

रिश्तों की कुछ लकीर सी उलझी,
उभर परी तो बस एक सवाल बन कर !

रोका हाथों से बहुत हमने,
बह ही जाते जज्बात बनके !

सुनी सी जब भी परती गालियाँ,
गुजर सी जाती कोई आवाज बन कर !

गुम से हो बोझिल नींदों में ,
बैठे हो क्यों ख्वाब बन कर ?

~ सुजीत

Labels: , , , , , , , , , , , ,