
है दंभ अब किन बातों का !
आंखे फाड़े काली रातों का !
विकट जो चुप्पी छाती है,
और तभी सुनामी आती है !
बौने से जो अब पेड़ खड़े,
साधी चुप्पी से मौन धरे !
ऐसी ऊँची झपटे मन को विकल कर जाती है!
और तभी सुनामी आती है !
देख अवयव अब मिश्रण का,
जो कहीं चूक हो जाती है ...
जीवन तरंग रेडियो सी बन जाती है !
भरते थे हुंकार शक्ति का,
हाथों में था भार उसीका !
परमाणु दानव मुँह जो अपना फैलाती है !
और तभी सुनामी आती है !
सन्नाटो में शोर जमीं का,
एक बचपन मासूम किसी का,
घर पहुचानें को जब कह जाती है,
दिल क्रन्दन तब कर जाती है ...
और तभी सुनामी आती है !
रचना : सुजीत
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