क्या है !

देखा हर नब्ज जिंदगी का ..
पूछ बैठा इरादा क्या है !

जब समझ बैठा कोई परछाई ..
तब देखा मेरा साया क्या है !

रह रह झलक जाता जब कोई ..
देखे न दिखा नजारा क्या है !

खामोश दीखते हर राहों पर जब ..
फिर पूछते तेरा वादा क्या है !

मुस्कुराहटो को छिपा रखा सिरहाने ..
तो समझा तेरा बहाना क्या है !

फासले बढे तो बढे चुप थे ..
रो परे जब पूछा ठिकाना क्या है !

रचना : सुजीत कुमार लक्की

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