यूँ बार बार तकते कुछ उस ओर,
कहीं कुछ आहटो पर भाग के जाते..
जैसे फिर घंटो नजरो लगाये उस सुनसान राहों पर ,
जैसे कोई कह गया हो, वापस आने को ..
कभी खुद से जदोजहद कर बैठते,
कभी राह तकते किसी के लौट आने की..
अपने ही सपने पराये से परे है सिरहाने मे..
जैसे कुछ तपिश अभी भी है, राख के खजाने मे,
हाथों की लकीरों को अक्सर छुपा लेते,
कहीं दिख न जाये, मेरे ख्वाबो की तस्वीरे ..
कभी कभी थक के मायूस, थोरा भटकता..
अपने पर झल्लाता, थोरा संभलता ..
ऐसा लगता ,
अपना बचपना गया नही ..
रचना : सुजीत कुमार लक्की
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