
आज शाम का अलाव कुछ सुना सा था ,
न पहले के तरह घेर के उसे बैठा था कोई ..
न ही कोई छिरी चर्चा उस अलाव के इर्द गिर्द,
न ही था कोई सरकारी महकमे का मुद्दा ,
या न ही छेरा किसी ने क्रिकेट का किस्सा ..
सर्द की ठिठुरन ने नजाने,
क्यों जमा दिया एक पर्त इस चौपाल पर,
जहा होता था एक अलाव, घेरे रहते थे लोग ,
और सुलगते अधजले लकड़ियों के मध्य होता था एक विनोद ..
दूर कहीं एक राहगीर छेरता मल्हार..
किसी यादों मे गुन गुनाता मन का तार ..
शायद अब इस सर्द मे तपिस आ गयी है..
सुलगा रखा है ..इस सर्द ने इंसानों को ..
पर बाट जोहे ठिठुरते है सूने चौपाल ..
रचना : सुजीत कुमार लक्की
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