ये बारिश गुनगुनाती थी , इसी छत की मुंडेरो पर..
ये घर की खिर्कियों के कांच पर ऊँगली से लिख जाती थी संदेशे ,
पर बिलखती रहती है बैठी हुई , अब बंद रोशन दानो के पीछे ..
दुपहरे ऐसी लगती है , बिना मोहरों के खली खाने रखे है ,
न कोई खेलने वाला है बाजी , और न कोई चल चलता है .
न कोई खेलने वाला है बाजी , और न कोई चल चलता है ..
न दिन होता , न रात होती , सभी कुछ रुक गया है ..
वो क्या मौसम का झोंका था ,
जो इस दीवार पर लटकी हुई तस्वीर तिरछी कर गया ...
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