इन्द्रधनुषी रंग जिंदगी के ...My LifeStream -1


यूँ रफ़्तार बहुत ही तेज थी ... टुकड़ो टुकड़ो को समेटा..
देखो बन रहा इन्द्रधनुष सा ...कुछ रंग थे इस तरह ...

(चाँद ने क्या लिखा रात की हथेली पर ! ! )

यूँ चांदनी रात थी.. और ये तुम्हारी ही आहटें थी..
चाँद भी उतर आया था हमारे पास .. बस यूँ झकझोरा किसी ने तो ...
न तुम थे ..और वो चाँद दूर मुस्कुरा रहा था मेरी तन्हाई पर ...

(हमने भी सजा डाले कुछ अनजाने ख्वाब ! ! )

एक ख्वाब हू तेरी आँखों से जा रहा !
एक आंसू हू बस बहा जा रहा ..रोक ले जिंदगी को यूँ जाने से ...
धीमा धीमा देख तुझसे नजरे चुरा रहा हूँ ...

(अजनबी शहर में एक संग दिखा जब ! ! )

इस शहर से कदम मिलाने की कोशिश कर बैठे है !
बस आपसे थोरी दोस्ती की ख्वाहिश कर बैठे है ?
शायद ठुकरा दे ये गुजारिश कोई , हम तो बस एक साजिश कर बैठे है ...

(एक इन्तेजार ऐसा भी ! !)

राह पे लगी थी आंखें की कोई तो आयेगा जो कह गया था लौट के आने को ...
देखते रहे तब तक जब तक ये आंखें बोझिल हो के न खो गयी नींद के आगोश मे ..
बस गुस्ताखी थोरी की हमने ...जाते जाते फिर आने की गुजारिश कर बैठे !

(थोरी गुजारिश ! !)

रुकने की गुजारिश नही .. बस वापस आने की खाव्हिश है ...!

रचना : सुजीत कुमार लक्की

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