
आज मे अपने गाँव चला ...
कुछ ममता मिल जाये आँचल की,
आज फिर उनको लेने चला !
जिन गलियों मे बीता मेरा बचपन,
आज फिर उनको जीने चला !
कुछ नजरे बोझिल राहों पर ,
उनको मे तर करने चला !
कुछ नजरे हो अनजानी सी,
उनसे भी गले मे मिलने चला !
दादी अम्मा ने कहा "वक्त का कहाँ भरोसा "
मैं वक्त के साथ दौर लगाने चला !
आती जाती बिजली हो..
उबार खबर रस्ते हो..
इन्टरनेट मेट्रो की दुनिया से,
अपनी मिट्टी पर मैं जीने चला .
आज मे अपने गाँव चला ...
रचना : सुजीत कुमार लक्की
Labels: going to home, going to my home, Hindi Poem on village, Indian Village, my village, गाँव