अब मुझे इन्तेजार कहाँ ! - A Poem


अब मुझे कोई इन्तेजार कहाँ !
तेरी मायूसी का ऐतबार कहाँ !

यूँ भागे है किस तरफ तब से ,
की अब हमे चैन कहाँ !

पिघल जाये ये दिल आंसुओं  से ,
पर उन्हें रोकने वाले हाथ कहाँ !

क्यों रुक जाये हम जाने से , 
मुझे रोकने वाले वो आवाज कहाँ ! 

अब मुझे कोई इन्तेजार कहाँ...

रचना : सुजीत कुमार लक्की

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