शब्दो के दरमियाँ फासले बहुत थे ,
पर कुछ बातें तो निकली जुबान से !
अनसुनी न थी बातें मेरी ,
मगर गुस्ताख़ी का नाम दे गये !
यूँ तो फिदरत ही नही समझाने की,
कहते कहते बस एक अंजाम दे गए !
रचना : सुजीत कुमार लक्की
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