
आहिस्ता आहिस्ता आगोश में आती ,
थोरी कपकपाती हाथों को सहलाती ,
ठिठुरती सिहरती ये बातें कह जाती ,
जब उनकी हँसी मन ही मन गुदगुदाती ,
ओस की बूँदें मन को है भरमाती ,
जब सूरज आँख मिचोली करके है जाती ,
कहीं अलाव पर जब बातें है छिड जाती,
और दूर कहीं कोई धुन है गुनगुनाती ,
जब सर्द की रातें है आती !
रचना : सुजीत कुमार लक्की
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