जब सर्द की रातें है आती !


आहिस्ता आहिस्ता आगोश में आती ,
थोरी कपकपाती हाथों को सहलाती ,
ठिठुरती सिहरती ये बातें कह जाती ,

जब उनकी हँसी मन ही मन गुदगुदाती ,
ओस की बूँदें मन को है भरमाती ,
जब सूरज आँख मिचोली करके है जाती ,

कहीं अलाव पर जब बातें है छि
जाती,
और दूर कहीं कोई धुन है गुनगुनाती ,
जब सर्द की रातें है आती !

रचना : सुजीत कुमार लक्की


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