रोज ख़त्म होता एक और दिन ...
एक शाम होती...
शाम का ढलता सूरज...
और क्या सोचते आप और हम ...
परिदृश्य . . .
शाम का डूबता सूरज , जैसे रात को आवाज लगा रही हो !
उदेव्लित सा मन , जैसे कुछ तलाशता थका सा हो रहा !
परिस्थिति . . . .
हम भी शामिल हो जाये, उस कारवां में जो सुकून तलाशने जा रही,
जैसे दिन की बेजान नैनो को, रात एक शीतलता देने जा रही हो ,
पथिक . .
कुछ जा रहे जहाँ, एक ममता की फुहार का इन्तेजार है,
या खुशिया छलकाती, अपनों के प्यार का ऐतबार है,
या किसी आंसू को, आज रात की मादकता का इंकार ,
पराकाष्ठा . . .
पर में क्यों बन रहा , इस कारवां का पंछी,
जिसे न तलाश , जिसे न प्यास ,
बस है तो बस इस ढलते सूरज का अहसास ! ! !
रचना : सुजीत कुमार लक्की (कुछ पंक्ति बद्ध नहीं है रचना बस भावो को चुन लीजये ! !)
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