वो चले गए ,
थोड़ा मुस्कुरा के गए,
हमे तो रुला के गए !
हम भी मगरूर पूछ ही लिया ,
कब आओगे लौट के,
वो बस अपना सर झुका के गए !
सोचा कुछ तस्वीरे थी किताबो पर ,
पर देखा था वो उनको भी मिटा के गए !
कहा मैंने भी ,
निकल जा मन तू भी राह अपनी ,
जब वो दामन ही छुरा के गए !
अब तो यादों का था साथ अपना,
शायद वो उनको भी भुला के गए !
ठिठका हुआ सा था में राह पर ही ,
पर वो चले गए , हमे तो रुला के गए ,
थोड़ा मुस्कुरा के गए !
रचना : सुजीत कुमार लक्की
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