Sunday, May 13, 2012

क्योँ नही बहलाती मुझे माँ !

याद उतनी ही है तेरी इस जेहन में बसी,
जैसे तेरी उँगलियाँ छु चल पड़ा इन राहों में !

और ना तुने रोका, कुछ तो कहा होता..
में इन राहों में चलता गया, कहाँ निकल आया !

अब क्योँ नही बहलाती मुझे माँ !
ना बताती ये रात है, सो जाओ !
क्योँ नही डराती उन झूठे कहानियों से,
कोई काले जादू वाला आता है,
जो उठा के कहीं ले जाता है दूर !

या सोचती, अब में डरता नही रोता नहीँ,
माँ बस पढ़े है मैंने दो शब्द किताबों के !

कहाँ सीख पाया हर गम में मुस्कुराना,
नही आता इस चेहरे में हर बात छुपाना !
पढ़ लेता तेरे चेहरे पर छुपते हुए लकीरों को,
तेरी हँसी में खोते हुए, बीते यादों को !

तेरी गोद में सर झुका लूँ फिर !
अब क्योँ नही ऐसे बहलाती मुझे माँ !

- : सुजीत भारद्वाज

Tuesday, May 8, 2012

Morning Again ..!

शब्द जब रंग मंच पर उतरे !
अपने अपने किरदार को खेले !

में खरा वहाँ मुसकाता रहा,
हर उलझन को सुलझाता रहा !

ये आहट किस और से आती है !
मंजिल ना नजर अब आती है,
बस रस्ते पर ले जाती है !

इच्छाओं की झोली में जीता,
इस बार भी ये बसंत यूँ बीता !
निर्जन पथ पर, कभी जो सोता !

जब ..!

रात अनंत बन जाती है ..
इस जीवन को जीवंत बनाने ..
एक सुबह फिर आस जगाती है !

- : सुजीत भारद्वाज

Sunday, April 22, 2012

अल्ल्हर बातें !

एक अल्ल्हर बातें है जैसे,
सपने का पलना हो जैसे !
अठखेली हवाओं जैसी !
बावरी मन चंचल हो जैसी !

आशाओं की डोरी सी !
बातें करती पहेली सी,

एक तस्वीर ....

ख्वाबो में एक तस्वीर सी बनती,
हया धड़कन के पहलु में छुपती,
झुकी नजर में शर्माती हँसती,
नाजुक मन आँखों में सिमटी !

एक ख्वाब ...
कभी इन्तेजार में सज जाते पल !
बिन बुलाये सता जाते हर पल !


कल देखा था उन चेहरों में गम का जो हलचल,
शिकन भी उठते रहे इन चेहरों में भी पल पल !

ना सच है अल्ल्हर बातों का,
ना श्वेत श्याम किसी रातों का,

ना डोर है इन हवाओँ में कहीं,
जो नूतन तान से बहते है,
अलसाती सी हवाएँ बनकर,
खिडकी पर चुपके से आकर,
कभी पुरवैया से गीत सुनाकर,
बेसुध मन में जो समाकर,
सखा बन बातें करते है !

जीवनमयी गीत में एक धुन को सजाकर,
अपनों का कभी अहसास कराकर,

रिश्तों की एक डोर थमाकर ..,
कभी हम उलझे, और कभी जो सुलझे !

ये अल्ल्हर बातें .. किसकी .. शायद कोई ना समझे !

Wednesday, April 18, 2012

जिंदगी आखिर जिंदगी ही है..

एक संगीत कभी सुमधुर तानो भरा,
कभी अनसुना विस्मित रागों सना !

एक हँसी कभी खुशी लहरों भरा,
कभी व्यंग्य के उपहासो से जना !

एक क्रंदन कभी नयनों में भरा !
कभी रुदन आद्र मन में बना !

एक ख्वाब कभी पलकों में भरा,
कभी वह पतझर पंछी बन उड़ा !

सवाल ख़ामोशी के साया में परा,
राहों में उलझे, पग पग पर है पाषाण जड़ा !

तूफां और नाकामी, मंजिल पर खड़ा !
कब डरा, कब रुका .. ??
जिंदगी आखिर जिंदगी, तेरे संग मैं चला !

सुजीत भारद्वाज

Thursday, March 29, 2012

4th Floor Thoughts !

The Age of Orthodox thinking...But where we stand; Our Country lost the credentials of New Facet of Innovation. Are we facing the Mind Drain or Influenced with Amplification of Physical Amenities and Glitz of Modernization?

“On 4th Floor in Front of PC; the thoughts which create anxiety in mind, Questioning with our soul.
Our doing is worth doing, what innovation we emerged for our country or People?

India fall short of Scientific Research.. Our P.M Said

“ Expressing concern that countries like China had overtaken India in terms of position in the world of science, he said there need to do much more to change the face of Indian science “

Even We never think about these things..

We want to live a secure, saturated, Life..

“A office at 4th Floor with comfort chair, Iphone in hand, Sports Bike for Weekends Ride ..!

India Where Engineers Works In Bank and MBA’s Work in IT Company!

We need to think about – “We born with difference faces, so God wants us to be different and work different!! “

We Need to come over bureaucracy and political interference..

“Give Wings To Dreams, Fly High and Make Their Own Mark” - Dr. A. P. J. Abdul Kalam

Sports to Tech we are facing creative blocks ... we have to opt out !

ये सिडनी के मैदान में धुल चाटने की हो या, इंग्लैंड में लार्ड्स में घुटने टेके दासता !
कहीं ना कहीं हमारी सोच का प्रवाह ही अवरुद्ध हो रहा !

शायद हम स्वयं की सरकार की बहुमत जुटाने में कहीं आगे जाते जा रहे !
अपना घर, अपना गाड़ी, अपना ऑफिस ..समाज से कटाव भी इसका एक अंश है !

क्योँ देश की संप्रभुता, रक्षा जैसे मुद्दे पर, बातें जगजाहिर हो रही,
विषय भ्रष्टाचार या नैतिक पतन का नहीं, शायद सोचे तो ये कटु सत्य हमारी आत्मनिर्भरता की है,
आज भी विदेशी कंपनी के कारार हावी है हमारी अर्थव्यस्था पर !

देश तो वही है, आर्यभट्ट थे जहाँ, विवेकानंद थे जहाँ !
हम ही अपनी संपूर्णता से कोसो दूर जा रहे !
अपने पहचान को खोते जा रहे ..??

[-- देख इस भीड को, सुन इस शोर को,
स्वप्न दिवा हो या निशा पहर का,
जीत की बाजी तो लगानी ही होगी,
लक्ष्य पाने के खातिर .....
कुछ तो सांसे गवांनी ही होगी ! --]

सुजीत भारद्वाज

Thursday, March 22, 2012

पलायन क्यों ??


पलायन क्यों ...

साढ़े साती सुबह, अलसाती कम्बल,
कोई गीत की धुन टकराएँ ऐसे..
तन से मन को वहाँ खीच ले गए जैसे,

है ये कौन सी, व्यथा या झूठा दम्भ,
तिल तिल घिसते तन और पल पल रोता मन !

है मेरी माटी ऐसी, जो दो जून का निवाला ना दे सके ?
सूख गए गाँव के वो कूप, जहाँ प्यास ही नही मिटती !

यहाँ का साथ जँचता नही, नाता वहाँ का टूटता नहीं !
ये दो पल की बात तुझसे माँ, अब कुछ भी छुपता नही !

सोचे थे बनते बाबूजी की लाठी, दवाई बन बैठे !
मन क्यों मेरा पाषाण, हम तो पलायन के बागी बन बैठे !

में और मेरी सोच हो गयी संगणक सी,
पीपल और बरगद भी झाड़ी बन बैठे !

किसने तोड़ा ये नाता, हम राहों के राही,
अब खुद के घर के सिपाही बन बैठे !

ये कैसी शिक्षा..गले में लटकाये तमगा,
झुके नजर हर इज्जत की दुहाई कर बैठे !

ना खुला आसमाँ.. ना रात चौपाल पुरानी,
हम हवाओं के रुख से भी बेवफाई कर बैठे !

अपना घर, अपना माटी, वो पनघट सुना !
कब लौटू ना जाने, लगे बस जग सुना ..

और पूछे ये पलायन क्यों ??

[शब्दों का हर फेर, पर कविता हर रंग समेटे रहते,
आज हम देश विदेश अपनी माटी, परिजनों से दूर,
किस कोरे सुख की अभिलाषा में भागे फिर रहे,
ना दिवाली ना होली आती,
ये ऊँची तालीम और ऊँचे तमगे हमारे पल पल आत्मसम्मान को झुकाती..
और मन में सवाल उठती है .. पलायन क्यों ?]

~ सुजीत भारद्वाज

Monday, March 12, 2012

इंसान हूँ हर पल सम्हलने वाला


मेरे सपनों को जलने दे,
यूँ ही मुझे सुलगने दे !

तेरी नियत से क्या वास्ता मेरा,
तू पत्थर है, हर कदम गिरने वाला,
में इंसान हूँ हर पल सम्हलने वाला !

जले ही सही कुछ ख्वाब है मेरे,
दबे ही सही कुछ अरमान है मेरे,

भटका ही सही, एक राह है मेरी,
दिखती नही, पर एक मंजिल है मेरी !

चेहरे बदल बदल कर छिपते हो,
हर रंग हर वेश में, हर देश में !

तू पत्थर है, हर कदम गिरने वाला,
में इंसान हूँ हर पल सम्हलने वाला !

# : $ujit

Wednesday, March 7, 2012

रंग फीका फाल्गुन !

चहुतेरे कूके कोयल,
बहका बहका शिशिर,
महका महका बसंत,
चहका चहका फाल्गुन !

गलीचे में छुपा गम ही गम,
कहना कैसा १०० भी है कम,

[ कुछ आती घर की याद ... ! ]

ना रोका ना टोका,
अपनी गली की हवा का झोंका,

ना हुई वो शाम, ना बही वो बयार,
बोझिल मन से कैसे मने ये त्यौहार !

मन में आये वो होली का गाँव,
जब छुट ही गया हर धुप और छांह !

[कुछ मायूस दोस्तों के लिये, अपने घर से दूर .. ! ]

यूँ अब तक हो बैठे, कुछ कर लो जनाब,
फीके चेहरों पर थोरा फेको गुलाल,
गा लो कुछ ऐसा, सा रा रा हो तान,
महको बहको शब जायज़ है आज,
कुछ ऐसी हो मस्ती .. रंग दो परवाज़


सुलभ जी ने तो होली को और रंगीन कर दिया अपने शब्दों में ..
{ तक धिनैया तक धिनैया छूट गईल बिहार
दिल्ली बम्बई के चक्कर में जिनगी बेकार }

Happy Holi To All of My Friends !

# सुजीत भारद्वाज

Sunday, March 4, 2012

लालटेन तले.. !

शाम की धमाचौकरी को एक फटकार विराम लगाती थी,
पैर पखारे सब लालटेन तले अपनी टोली सी बन जाती थी!

जोर जोर से पड़ते थे, हिंदी की किताबे..
लगता था एक होढ़ सा, हर आँगन से वही आवाजे आती थी !
नहीं हुआ है, अभी सवेरा, और खूब लड़ी मर्दानी की गाथा,
हम जोर जोर से गाते थे, कुर्सी पर बैठे दादा जी धीमे से मुस्काते थे !

जब पलके भारी हो जाती थी,
जब लालटेन धीमा पर जाता था !

आँखे बोझिल होने से पहले,
माँ थाली ले आ जाती थी !
और अपना मन, लालटेन तले,
बचपन में खो जाती थी !
धीरे धीरे ये सुन लालटेन भी सो जाती थी !

[About This Poem:]
महानगर की लैम्प पोस्ट या सतत रहती चकाचौंध, पर आज कंप्यूटर पर थिरकते उँगलियों की पौध लालटेन तले ही बनी थी,
वो बचपन की शाम, गाँव के हर घर पर अपने समयानुसार जलता लालटेन, और उसके इर्द गिर्द बैठे हम-उम्र बच्चे, यह केवल लालटेन युग का सूचक ही नही,
बल्कि समय , अनुसाशन, हमारे पूर्वजो की सजगता का भी परिचय देती, आज की द्रुत गति में हम भले ही नियत समय पर लालटेन तले ना घिरे,
पर लालटेन तले की रौशनी ..यूँ ही हमारे अंदर जलती जा रही ..
# सुजीत भारद्वाज

Tuesday, February 28, 2012

Silent Samurai

Quiet between the four walls,
My Hand covered lament eyes,
It is a city where dreams decorated,
Why this city shatter my all dreams..

An acquaintance that was left behind,
My stopped tired breath says a voice,
The path is hard, dark enough to,
You do not stop, do not get tired just to walk and walk!
Like a samurai.. Silent samurai..

Who quiet today, who down today..
One day he fly, one day he dream
Like a samurai.. Silent samurai..


Written by : Sujit..